गरीबी

folder_openMy Poetry
commentNo Comments

बच्चे का रोना रुला देता है
जब कहता है,
“माँ खिलौना दिला दे,
मेरे पास एक भी नहीं है माँ।”
माँ रोती है
पर दिल
हर सुनने वाले का दुखता है
जब बच्चा कहता है,
“माँ धूप बहुत है,
घर पर छत डलवा दे माँ।
सड़क पर पैर जलता है,
चप्पल खरीदवा दे माँ।”
इससे बड़ी बेबसी क्या होगी !
बच्चे की और दर्द भरी रुलाई क्या होगी !
पर तब पता चलता है
गरीबी कितना बड़ा जख्म देती है
जब बच्चे की सिसकती बिलखती आवाज आती है,
“माँ भूख लगी है,
खाना दे दे माँ।
कुछ तो कहीं से ला दे,
रोटी का एक टुकड़ा दे दे माँ।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Fill out this field
Fill out this field
Please enter a valid email address.
You need to agree with the terms to proceed

Menu